मां


जब मैं गूंगा था,आवाज़ मेरी थीं वो
मेरी छोटी हरकत से ही खुश हो जाती थीं वो

मेरा हंसना,उनका हंसना
मेरा मुस्कुराना,उनका मुस्कुराना
मेरी छोटे क़दमों पर ही
ख़ुशी से पागल हो जाना

कभी काम की व्यस्तता
पर मेरा ख्याल हमेशा रखना
मेरे एक एक ख़ुशी के लम्हे
को खुद मज़े से चखना

डपट लगाना कभी गलत पर
फिर खुद मुझे मनाना
लुकमे मेरे मुंह में भरना
खुद आधे पेट सो जाना

रात कभी जो मुझे डराती
सीने में वो मुझे बसातीं
प्यारी प्यारी लोरी गाकर
रोज मुझे सुलाना

दिल में कोमलता थी लेकिन
ऊपर कभी कठोरता
इसी तरह से रूप बनाकर
सीधी राह दिखाना

लाड़-प्यार से पाल पोषकर
बड़ा किया बचपन से यौवन
नज़र से अपनी करके दूर
आंसू खूब बहाना

जीवन की इस भाग दौड़ में
भूल जाता उनको मैं लेकिन
उनका रोज़ फोन लगाकर
हाल पता लगाना

छुट्टी शनिवार को रहती
तब तक भावनाओं में बहतीं
इन्तज़ार मेरे आने का
रस्ते आँख टिकाना

वापस मेरा फिर से जाना
आँखे दोनों की भर आना
ह्रदय पटल पर पत्थर रखकर
वापस मुझे भिजाना

दूरी और दूर से दूर
इच्छा मेरी सफलता की
पत्थर नहीं पहाड़ को रखकर
दूरी अधिक बढ़ाना

पता है मुझको मेरा जाना
दुपट्टे से अश्रु पोंछना
खुद को रोकना मुश्किल लेकिन
दम ख़म खूब लगाना

सुबह सुबह है मुझको जाना
दरवाज़े तक प्यार जताना
जैसे ही चलती है गाड़ी
आँखें डबडब भर जाना

बहुत रोकता खुद को लेकिन
किलो 1 मीटर बस जाकर
अम्मी की यादो में रंगकर
जी भर अश्रु बहाना

दूर किया खुद से है लेकिन
ख्याल हमेशा मेरा रखना
फ़ोन हमेशा करके कहना
ये खा लेना,वो खाना

कभी कभी हूँ खीझ भी जाता
लेकिन वो ममता की मूरत
कभी न गुस्सा होने वाली
प्यार सदा जताना

कभी कोई भी दुःख सुन लेतीं
परेशान मुझसे भी ज्यादा
बार बार मुझे काल लगाकर
खूब उपाय सुझाना

मेरी सेहत के बारे में
ख्याल है उनको मुझसे ज्यादा
मेरे घर जाते ही उनका
अच्छी डाइट बनाना

फिर घर से जब वापस आता
अश्रु धार का वही सिलसिला
पूरा चित्रण फिर हो जाता
वही बात दोहराना

माँ मैं तेरे एहसानों का
कैसे क़र्ज़ चुकाऊंगा
तेरी ममता के बारे में
पूरा न लिख पाउँगा

गर मैं हड्डियां क़लम बना लूँ
खून बना लूँ स्याही
ममता तेरी लिखता जाऊँ
क्रम से बारी बारी
घिस के हड्डियां निपट जाएंगी
कम पड़ेगी स्याही

गर मैं क़र्ज़ चुकाना चाहूं
बूँद दूध का तेरे
दुनिया के सारे चरिंद का
दूध मैं ला दूँ नेरे(पास)
एक बूँद दूध को तेरे
रख दूँ एक पलड़े में
और दूध दुनिया का सारा
रख दूसरे पलड़े में
झुक जायेगा पलड़ा तेरा
एक बूँद ही लाऊं
माँ तेरे मैं बूँद दूध का
क़र्ज़ चुका न पाऊँ

गर जीवन भर क़दम पे तेरे
सेवक बन के बैठूं
दिवा-निशा बस सेवा तेरी
ऐसा ही कर पैठूं
एक रात तेरी सेवा का
मोल चुका न पाऊँ
माँ तेरे मैं बूँद दूध का
क़र्ज़ चुका न पाऊँ

गर अपने कंधे बैठाकर
मक्का लेके जाऊँ
और फिर वापस अपने ही
कंधे पे बिठा के लाऊँ
अस्पताल तक ले जाने का
भी बदला न दे पाऊं
माँ तेरे मैं बूँद दूध का
क़र्ज़ चुका न पाऊँ

सर पर मेरे हमेशा माँ बस तेरा ही हाथ रहे
कोई रहे चाहे न रहे बस तू ही मेरे साथ रहे

✍️मो यूसुफ़ फ़ारूक़ी

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