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एक शाम, दो नाम

नाम एक शाम,दो नाम एक निश्छल,एक व्यापक सफर एक किलोमीटर का अपार खुशियां,अपार राहत टांग खींचना,कभी चिढाना मना करना या मनाना बातों में कभी कभी झलकती अश्लीलता लेकिन इसके बिना भी कहीं है क्या प्रसन्नता एक मेरी बेदम उम्मीद को दमदार हवा भरता वहीं दूसरा सकारात्मक अपमान है करता सब अपनी भावनाओं को ख़ुशी से बांटा करते और सब समस्या का हल निकाला करते सफर पूरा हुआ  लेकिन फिर भी आधा चाय की फरमाइश बिना पूरा नहीं,आधा एक दूसरे पर बिल का बोझ लदाते झगड़ा करते हँसते मुस्कुराते अंततः किसी की जेब में खनके चिल्लर दो में तीन कटिंग ख़ुशी से पीकर वापस एक किलोमीटर एक निश्छल,एक व्यापक..... ✍️मो यूसुफ़ फारूकी

किसान:एक व्यथा

मैने देखा उसके सर पर साफा लिए हाथ में हल और बीजा जोत रहा है खेत पसीना टप-टप होता भरी दुपहरिया थका है भूख पेट में लेकिन घिसते काँधे सभी पहरिया सूरज सर के ऊपर श्वेद पैर के नीचे अब करने को भोजन ढूँढे ठण्डी छहिया खड़ा सामने सूखा बंबुल ओट मे उसकी  वो छिपने की करे चेष्टा कहाँ दे छाया सूखा बंबुल झड़ गयी उससे  हरी पत्तियाँ उतार साफा रखा भूमि पर उठाया अपना  वो मटमैला फटा सा कुर्ता जिसकी इधर उधर जेबों से निकाली उसने छोटी पन्नियाँ नमक एक में,एक मे रोटी एक ही रोटी  खाकर आधी भूख मिटाई पानी पीने चला नहरिया गन्दा सा पानी चुल्लू मे भरा पिया उसको जी भरकर अब वापस वह  खेत को अपने अभी जोतनी बहुत है बाँकी भूमि बंजरिया मैने देखा उसके सर पर साफा लिए हाथ में हल और बीजा जोत रहा है खेत पसीना टप-टप होता भरी दुपहरिया