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किसान:एक व्यथा

मैने देखा उसके सर पर साफा लिए हाथ में हल और बीजा जोत रहा है खेत पसीना टप-टप होता भरी दुपहरिया थका है भूख पेट में लेकिन घिसते काँधे सभी पहरिया सूरज सर के ऊपर श्वेद पैर के नीचे अब करने को भोजन ढूँढे ठण्डी छहिया खड़ा सामने सूखा बंबुल ओट मे उसकी  वो छिपने की करे चेष्टा कहाँ दे छाया सूखा बंबुल झड़ गयी उससे  हरी पत्तियाँ उतार साफा रखा भूमि पर उठाया अपना  वो मटमैला फटा सा कुर्ता जिसकी इधर उधर जेबों से निकाली उसने छोटी पन्नियाँ नमक एक में,एक मे रोटी एक ही रोटी  खाकर आधी भूख मिटाई पानी पीने चला नहरिया गन्दा सा पानी चुल्लू मे भरा पिया उसको जी भरकर अब वापस वह  खेत को अपने अभी जोतनी बहुत है बाँकी भूमि बंजरिया मैने देखा उसके सर पर साफा लिए हाथ में हल और बीजा जोत रहा है खेत पसीना टप-टप होता भरी दुपहरिया